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ग़ज़ल
नज़िक में उन के जाने को ख़ुशी सूँ शाद हूँ दिल में
वले लोगों में दिखलाने कूँ हो बेज़ार बैठूँगी
हाश्मी बीजापुरी
नज़्म
व-यबक़ा-वज्ह-ओ-रब्बिक (हम देखेंगे)
जो ग़ाएब भी है हाज़िर भी
जो मंज़र भी है नाज़िर भी
फ़ैज़ अहमद फ़ैज़
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ग़ज़ल
आँखों में नमी सी है चुप चुप से वो बैठे हैं
नाज़ुक सी निगाहों में नाज़ुक सा फ़साना है
जिगर मुरादाबादी
शेर
कह रहा है शोर-ए-दरिया से समुंदर का सुकूत
जिस का जितना ज़र्फ़ है उतना ही वो ख़ामोश है
नातिक़ लखनवी
ग़ज़ल
मुझ से लाग़र तिरी आँखों में खटकते तो रहे
तुझ से नाज़ुक मिरी नज़रों में समाते भी नहीं
दाग़ देहलवी
नज़्म
दरख़्त-ए-ज़र्द
ज़बाँ अपनी ज़बाँ मैं तुम को आख़िर कब सिखा पाया
अज़ाब-ए-सद-शमातत आख़िरश मुझ पर ही नाज़िल हो













