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ग़ज़ल
ये वो मौसम है जिस में कोई पत्ता भी नहीं हिलता
दिल-ए-तन्हा उठाता है सऊबत शाम-ए-हिज्राँ की
अहमद मुश्ताक़
ग़ज़ल
नाज़ुकी को 'इश्क़ में क्या दख़्ल है ऐ बुल-हवस
याँ स'ऊबत खींचने को जी में ताक़त चाहिए
मीर तक़ी मीर
शेर
ये वो मौसम है जिस में कोई पत्ता भी नहीं हिलता
दिल-ए-तन्हा उठाता है सऊबत शाम-ए-हिज्राँ की
अहमद मुश्ताक़
ग़ज़ल
हम-नशीं पूछ न कुछ चुप ही भली है उस से
शब-ए-फ़ुर्क़त में जो कुछ हम पे सऊबत गुज़री














