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ग़ज़ल
चमन में इख़्तिलात-ए-रंग-ओ-बू से बात बनती है
हम ही हम हैं तो क्या हम हैं तुम ही तुम हो तो क्या तुम हो
सरशार सैलानी
नज़्म
वालिदा मरहूमा की याद में
गिर्या-ए-सरशार से बुनियाद-ए-जाँ पाइंदा है
दर्द के इरफ़ाँ से अक़्ल-ए-संग-दिल शर्मिंदा है
अल्लामा इक़बाल
ग़ज़ल
'रसा' गर जाम-ए-मय ग़ैरों को देते हो तो मुझ को भी
नशीली आँख दिखला कर करो सरशार होली में
भारतेंदु हरिश्चंद्र
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नज़्म
नानक
बरहमन सरशार है अब तक मय-ए-पिंदार में
शम-ए-गौतम जल रही है महफ़िल-ए-अग़्यार में
अल्लामा इक़बाल
शेर
इक शक्ल हमें फिर भाई है इक सूरत दिल में समाई है
हम आज बहुत सरशार सही पर अगला मोड़ जुदाई है
अतहर नफ़ीस
शेर
चमन में इख़्तिलात-ए-रंग-ओ-बू से बात बनती है
हम ही हम हैं तो क्या हम हैं तुम ही तुम हो तो क्या तुम हो
सरशार सैलानी
ग़ज़ल
चश्म-ए-मा रौशन कि उस बेदर्द का दिल शाद है
दीदा-ए-पुर-ख़ूँ हमारा साग़र-ए-सरशार-ए-दोस्त
मिर्ज़ा ग़ालिब
नज़्म
तुम नहीं आए थे जब
ग़म के पैमाना-ए-सर-शार को छलकाते हुए
बर्ग-हा-ए-लब-ओ-रुख़्सार को महकाते हुए
अली सरदार जाफ़री
नज़्म
अपनी मल्का-ए-सुख़न से
सरशार अँखड़ियों के दहकते शबाब से
मौज-ए-नफ़स के इत्र से मुखड़े की आब से
जोश मलीहाबादी
ग़ज़ल
वही मय-ख़्वार है जो इस तरह मय-ख़्वार हो जाए
कि शीशा तोड़ दे और बे-पिए सरशार हो जाए
जिगर मुरादाबादी
ग़ज़ल
साक़ी ने दिया क्या मुझे इक साग़र-ए-सरशार
गोया कि दो आलम से 'ज़फ़र' बे-ख़बरी दी












