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ग़ज़ल
बैरन रीत बड़ी दुनिया की आँख से जो भी टपका मोती
पलकों ही से उठाना होगा पलकों ही से पिरोना होगा
मीराजी
नज़्म
इंतिज़ार
रात भर दीदा-ए-नमनाक में लहराते रहे
साँस की तरह से आप आते रहे जाते रहे
मख़दूम मुहिउद्दीन
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नज़्म
हसन कूज़ा-गर (2)
कि तिरे घर के दरीचों के कई शीशों पर
उस से पहले की भी दुर्ज़ें थीं बहुत
नून मीम राशिद
नज़्म
मिरे अहद के हसीनो
कभी रिफ़अ'तों पे लपकीं कभी वुसअ'तों से उलझीं
कभी सोगवार सोएँ कभी नग़्मा-बार जागीं
साहिर लुधियानवी
नज़्म
अपनी मल्का-ए-सुख़न से
इन सब के इम्तिज़ाज से पैदा हुई है तू
कितने हसीं उफ़ुक़ से हुवैदा हुई है तू
जोश मलीहाबादी
नज़्म
हिण्डोला
यहीं घरोंदों में सीता सुलोचना राधा
किसी ज़माने में गुड़ियों से खेलती होंगी
फ़िराक़ गोरखपुरी
ग़ज़ल
मिरी छत से रात की सेज तक कोई आँसुओं की लकीर है
ज़रा बढ़ के चाँद से पूछना वो उसी तरफ़ से गया न हो
बशीर बद्र
नज़्म
बरसात की बहारें
झड़ियों की मस्तियों से धूमें मचा रहे हैं
पड़ते हैं पानी हर जा जल-थल बना रहे हैं
नज़ीर अकबराबादी
ग़ज़ल
वक़्त से दिन और रात वक़्त से कल और आज
वक़्त की हर शय ग़ुलाम वक़्त का हर शय पे राज






