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मीर सोज़

1721 - 1798 | दिल्ली, भारत

ग़ज़ल 17

शेर 7

जिस का तुझ सा हबीब होवेगा

कौन उस का रक़ीब होवेगा

सर ज़ानू पे हो उस के और जान निकल जाए

मरना तो मुसल्लम है अरमान निकल जाए

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जिस दिन से यार मुझ से वो शोख़ आश्ना हुआ

रुस्वा हुआ ख़राब हुआ मुब्तला हुआ

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पुस्तकें 7

Deewan-e-Meer Soz

 

1963

Deewan-e-Soz

 

1905

Intekhab-e-Kalam-e-Meer Soz

 

2000

इंतिख़ाब कलाम-ए-मीर सोज़

 

1991

Intikhab-e-Deewan-e-Meer Soz

 

 

Intikhab-e-Meer Soz

 

1983

Kulliyat-e-Soz

 

 

 

ऑडियो 10

अगर मैं जानता है इश्क़ में धड़का जुदाई का

अपने नाले में गर असर होता

जितना कोई तुझ से यार होगा

Recitation

aah ko chahiye ek umr asar hote tak SHAMSUR RAHMAN FARUQI

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