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ग़ज़ल
झुक के मिलने की अज़ल ही से है फ़ितरत 'शाइक़'
गरचे सर-बस्ता-ए-दस्तार-ए-अना हूँ मैं भी
शाइक़ मुज़फ़्फ़रपुरी
ग़ज़ल
समेटता हूँ मैं नाकामियों को जब 'शाइक'
मिरा मज़ाक़ उड़ाती हैं ख़्वाहिशात मिरी
शाइक़ मुज़फ़्फ़रपुरी
ग़ज़ल
दिल-ए-ज़ख़्मी है शाएक़ बू-ए-गुल और शोर-ए-बुलबुल का
रफ़ू-गर फ़स्ल-ए-गुल में ये गरेबाँ चाक रहने दे
वली उज़लत
ग़ज़ल
जीना हो अब कि मरना डूबें कि पार उतरें
कश्ती है अपनी 'शाएक' हाथों में नाख़ुदा के
रियाज़त अली शाइक
ग़ज़ल
चलते हो परिस्ताँ में परियाँ हैं बहुत शाएक़
अब हुस्न-ए-परी-ख़ाना फिर आज से अफ़्ज़ूँ है
वाजिद अली शाह अख़्तर
कुल्लियात
जी सारे तन का खिंच कर आँखों में आ रहा है
किस मर्तबे में हम भी हैं देखने के शाएक़





