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ग़ज़ल
इस शहर में किस से मिलें हम से तो छूटीं महफ़िलें
हर शख़्स तेरा नाम ले हर शख़्स दीवाना तिरा
इब्न-ए-इंशा
नज़्म
मैं पल दो पल का शा'इर हूँ
मैं पल दो पल का शा'इर हूँ पल दो पल मिरी कहानी है
पल दो पल मेरी हस्ती है पल दो पल मिरी जवानी है
साहिर लुधियानवी
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Gair
ग़ैर غَیْر
अपने कुटुंब या समाज से बाहर का (व्यक्ति), जिसके साथ आत्मीयता का संबंध न हो, अनात्मीय, पराया, बेगाना, अजनबी, अनजान, दूसरा, जैसे: ग़ैर-इलाक़े या ग़ैर मुल्क का
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नज़्म
ये मेरी ग़ज़लें ये मेरी नज़्में
वो तेरा शाइ'र तिरा मुग़न्नी
वो जिस की बातें अजीब सी थीं
अहमद फ़राज़
ग़ज़ल
नासिर काज़मी
नज़्म
बहुत ख़ूब-सूरत हो तुम
जो लम्हों ही लम्हों में दुनिया बदल दे
जो शाइ'र को दे जाए पहलू ग़ज़ल के
ताहिर फ़राज़
नज़्म
फ़रमान-ए-ख़ुदा
तहज़ीब-ए-नवी कारगह-ए-शीशागराँ है
आदाब-ए-जुनूँ शाइर-ए-मशरिक़ को सिखा दो
अल्लामा इक़बाल
ग़ज़ल
'नुशूर' अहल-ए-ज़माना बात पूछो तो लरज़ते हैं
वो शा'इर हैं जो हक़ कहने से कतराया नहीं करते










