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ग़ज़ल
ख़ून ही की शिरकत वो न क्यूँ हो शिरकत चीज़ है झगड़े की
अपनों से वो देख रहा हूँ जो न करे बेगाना भी
आरज़ू लखनवी
ग़ज़ल
सियह पोशाक दोश-ए-नाज़ पर बिखरी हुई ज़ुल्फ़ें
मिरे मातम की शिरकत को बड़े जोबन से निकलेंगे
मुज़्तर ख़ैराबादी
ग़ज़ल
इक़बाल अज़ीम
हास्य
रक़ीबों ने हमारी ख़ाना-आबादी में शिरकत की
उसी मौक़ा पे ये कम्बख़्त अड़ जाते तो अच्छा था
मसरूर शाहजहाँपुरी
नज़्म
एक शाएरा की शादी पर
शिरकत-ए-ग़ैर से बेगाना थे नग़्मे तेरे
इस्मत-ए-हूर का अफ़्साना थे नग़्मे तेरे
अख़्तर शीरानी
ग़ज़ल
क़ाइल-ए-वहदत हूँ शिरकत का तमन्नाई नहीं
तू जो तन्हा है तो मुझ को फ़िक्र-ए-तनहाई नहीं














