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नज़्म
आज बाज़ार में पा-ब-जौलाँ चलो
हाकिम-ए-शहर भी मजमा-ए-आम भी
तीर-ए-इल्ज़ाम भी संग-ए-दुश्नाम भी
फ़ैज़ अहमद फ़ैज़
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नज़्म
दरख़्त-ए-ज़र्द
ये ख़त लिखना तो दक़यानूस की पीढ़ी का क़िस्सा है
ये सिंफ़-ए-नस्र हम ना-बालिग़ों के फ़न का हिस्सा है
जौन एलिया
ग़ज़ल
वफ़ा कैसी कहाँ का इश्क़ जब सर फोड़ना ठहरा
तो फिर ऐ संग-दिल तेरा ही संग-ए-आस्ताँ क्यूँ हो
मिर्ज़ा ग़ालिब
नज़्म
परछाइयाँ
ये सर-ज़मीन है गौतम की और नानक की
इस अर्ज़-ए-पाक पे वहशी न चल सकेंगे कभी














