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ग़ज़ल
जो दम हुक़्क़े का दूँ बोले कि मैं हुक़्क़ा नहीं पीता
भरूँ जल्दी से गर सुल्फ़ा कहे सुल्फ़ा नहीं पीता
मुसहफ़ी ग़ुलाम हमदानी
नज़्म
शिकवा
सफ़्हा-ए-दहर से बातिल को मिटाया हम ने
नौ-ए-इंसाँ को ग़ुलामी से छुड़ाया हम ने
अल्लामा इक़बाल
नज़्म
व-यबक़ा-वज्ह-ओ-रब्बिक (हम देखेंगे)
सब बुत उठवाए जाएँगे
हम अहल-ए-सफ़ा मरदूद-ए-हरम
फ़ैज़ अहमद फ़ैज़
नज़्म
जवाब-ए-शिकवा
सफ़्हा-ए-दहर से बातिल को मिटाया किस ने
नौ-ए-इंसाँ को ग़ुलामी से छुड़ाया किस ने
अल्लामा इक़बाल
नज़्म
आज बाज़ार में पा-ब-जौलाँ चलो
शहर-ए-जानाँ में अब बा-सफ़ा कौन है
दस्त-ए-क़ातिल के शायाँ रहा कौन है
फ़ैज़ अहमद फ़ैज़
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ई-पुस्तक
सूफ़ी काव्य
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नज़्म
मिरे हमदम मिरे दोस्त!
तेरी पेशानी से ढल जाएँ ये तज़लील के दाग़
तेरी बीमार जवानी को शिफ़ा हो जाए
फ़ैज़ अहमद फ़ैज़
शेर
इस आलम-ए-वीराँ में क्या अंजुमन-आराई
दो रोज़ की महफ़िल है इक उम्र की तन्हाई
सूफ़ी ग़ुलाम मुस्ताफ़ा तबस्सुम
नज़्म
दर्द आएगा दबे पाँव
दर्द और जंग में कुछ मेल नहीं है ऐ दिल
लाओ सुल्गाओ कोई जोश-ए-ग़ज़ब का अँगार












