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नज़्म
याद-ए-अलीगढ़
कभी बज़्म-ए-अहबाब में शोला-अफ़्शाँ
कभी यूनियन में थे शमशीर-ए-बुर्रां
आबिदुल्लाह ग़ाज़ी
नज़्म
यकुम मई
आज लेबर-यूनियन में शादमानी आई है
आज मज़दूरों को याद अपनी जवानी आई है
सय्यद मोहम्मद जाफ़री
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नज़्म
मुझ से पहली सी मोहब्बत मिरी महबूब न माँग
तेरी आँखों के सिवा दुनिया में रक्खा क्या है
तू जो मिल जाए तो तक़दीर निगूँ हो जाए
फ़ैज़ अहमद फ़ैज़
नज़्म
रक़ीब से!
कारवाँ गुज़रे हैं जिन से उसी रानाई के
जिस की इन आँखों ने बे-सूद इबादत की है
फ़ैज़ अहमद फ़ैज़
नज़्म
शिकवा
शान आँखों में न जचती थी जहाँ-दारों की
कलमा पढ़ते थे हमीं छाँव में तलवारों की



