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नज़्म
बंजारा-नामा
क्या साज़ जड़ाओ ज़र-ज़ेवर क्या गोटे थान कनारी के
क्या घोड़े ज़ीन सुनहरी के क्या हाथी लाल अमारी के
नज़ीर अकबराबादी
ग़ज़ल
तक़दीर ने क्या क़ुत्ब-ए-फ़लक मुझ को बनाया
मोहताज मिरा पाँव रहा ख़ाना-ए-ज़ीं का
वाजिद अली शाह अख़्तर
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ग़ज़ल
वो जो कहलाते थे ज़ीं-पेश तिरे यारों में
जान-ए-मन अब तो हमें भूल गया हम ही हैं
मुसहफ़ी ग़ुलाम हमदानी
कुल्लियात
कौन यूँ ऐ तुर्क-ए-रा'ना ज़ीनत-ए-फ़ितराक था
ख़ूँ से गुल-कारी अजब इक ज़ीन के दामन पे है
मीर तक़ी मीर
कुल्लियात
मिला या-रब कहीं उस सैद-अफ़्गन सर-बसर-कीं को
कि अफ़्शाँ कीजे ख़ून अपने से उस के दामन-ए-ज़ीं को
मीर तक़ी मीर
ग़ज़ल
हरगिज़ हुआ न यारो वो शोख़ यार अपना
ज़ीं पेश वर्ना हम ने क्या क्या कि कर न देखा
मुसहफ़ी ग़ुलाम हमदानी
शेर
ज़ीं-साज़ी अगर आती मुझे मैं तो मिरी जाँ
पलकों से बनाता तिरे फ़ितराक के डोरे













