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बेवफ़ा शायरी

कुछ तो मजबूरियाँ रही होंगी

यूँ कोई बेवफ़ा नहीं होता

बशीर बद्र

फिर उसी बेवफ़ा पे मरते हैं

फिर वही ज़िंदगी हमारी है

Interpretation: Rekhta AI

शायर कहता है कि वह फिर से उसी पत्थर-दिल महबूब के प्यार में पड़ गया है जो वफ़ा नहीं करता। इस वजह से उसकी ज़िंदगी उसी पुराने मोड़ पर खड़ी हुई है जहाँ सिर्फ़ दर्द और इंतज़ार है। यह शेर बताता है कि आशिक चाह कर भी अपनी पुरानी आदतों और अपनी तड़प से पीछा नहीं छुड़ा पाता और वही दुख भरी ज़िंदगी जीने को मजबूर है।

Interpretation: Rekhta AI

शायर कहता है कि वह फिर से उसी पत्थर-दिल महबूब के प्यार में पड़ गया है जो वफ़ा नहीं करता। इस वजह से उसकी ज़िंदगी उसी पुराने मोड़ पर खड़ी हुई है जहाँ सिर्फ़ दर्द और इंतज़ार है। यह शेर बताता है कि आशिक चाह कर भी अपनी पुरानी आदतों और अपनी तड़प से पीछा नहीं छुड़ा पाता और वही दुख भरी ज़िंदगी जीने को मजबूर है।

मिर्ज़ा ग़ालिब

किसी बेवफ़ा की ख़ातिर ये जुनूँ 'फ़राज़' कब तक

जो तुम्हें भुला चुका है उसे तुम भी भूल जाओ

अहमद फ़राज़

लो फिर तिरे लबों पे उसी बेवफ़ा का ज़िक्र

अहमद 'फ़राज़' तुझ से कहा बहुत हुआ

अहमद फ़राज़

आश्ना बेवफ़ा नहीं होता

बेवफ़ा आश्ना नहीं होता

मीर हसन

जो मिला उस ने बेवफ़ाई की

कुछ अजब रंग है ज़माने का

मुसहफ़ी ग़ुलाम हमदानी

बे-मुरव्वत हो बेवफ़ा हो तुम

अपने मतलब के आश्ना हो तुम

वाजिद अली शाह अख़्तर

फिर किसी बेवफ़ा की याद आई

फिर किसी ने लिया वफ़ा का नाम

साहिर होशियारपुरी

हम ने आलम से बेवफ़ाई की

एक माशूक़-ए-बेवफ़ा के लिए

वहशत रज़ा अली कलकत्वी

अभी से कैसे कहूँ तुम को बेवफ़ा साहब

अभी तो अपने सफ़र की है इब्तिदा साहब

इन्दिरा वर्मा
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