Mushafi Ghulam Hamdani's Photo'

मुसहफ़ी ग़ुलाम हमदानी

1747 - 1824 | लखनऊ, भारत

18वीं सदी के बड़े शायरों में शामिल, मीर तक़ी 'मीर' के समकालीन।

18वीं सदी के बड़े शायरों में शामिल, मीर तक़ी 'मीर' के समकालीन।

ग़ज़ल 268

शेर 593

'मुसहफ़ी' हम तो ये समझे थे कि होगा कोई ज़ख़्म

तेरे दिल में तो बहुत काम रफ़ू का निकला

लोग कहते हैं मोहब्बत में असर होता है

कौन से शहर में होता है किधर होता है

people say

where does this happen someone tell me where

बाल अपने बढ़ाते हैं किस वास्ते दीवाने

क्या शहर-ए-मोहब्बत में हज्जाम नहीं होता

पुस्तकें 48

Aayat-e-Mushafi

 

1953

Aqd-e-Surayya

 

1934

अक़द-ए-सुरय्या

 

2012

Bahr-ul-Mohabbat

 

 

दरिया-ए-इश्क़ और बहरुल मोहब्बत का तक़ाबुली मुताला

 

1972

Deewan-e-Mushafi

Volume-001

1966

deewan-e-Mushafi

 

1990

Deewan-e-Mushafi

Volume-001

1966

दीवान-ए-मुसहफ़ी

खण्ड-008

1995

दीवान-ए-मुस्हफ़ी

खण्ड-008

1995

चित्र शायरी 7

जो मिला उस ने बेवफ़ाई की कुछ अजब रंग है ज़माने का

दिल ही दिल में याँ मोहब्बत अपना घर करती रही हम रहे ग़ाफ़िल वो सौ टुकड़े जिगर करती रही

क्या काम किया तुम ने थी ये भी अदा कोई पर्दे से निकल आना और जी में समा जाना

 

वीडियो 4

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ऑडियो 5

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जब कि बे-पर्दा तू हुआ होगा

Recitation

aah ko chahiye ek umr asar hote tak SHAMSUR RAHMAN FARUQI

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