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फ़रेब शायरी

आशिक़ हूँ माशूक़-फ़रेबी है मिरा काम

मजनूँ को बुरा कहती है लैला मिरे आगे

Interpretation: Rekhta AI

इस शे’र में ग़ालिब प्रेम के दावे और उसके भीतर की चालाकी को सामने रखते हैं। बोलने वाला खुद को आशिक़ कहता है, लेकिन स्वीकार करता है कि वह महबूब को बहकाकर छलता है। लैला का मजनूँ की बुराई करना बताता है कि मशहूर आदर्श प्रेम-कथा में भी ईर्ष्या, स्वार्थ और बदनामी की बात घुस सकती है।

Interpretation: Rekhta AI

इस शे’र में ग़ालिब प्रेम के दावे और उसके भीतर की चालाकी को सामने रखते हैं। बोलने वाला खुद को आशिक़ कहता है, लेकिन स्वीकार करता है कि वह महबूब को बहकाकर छलता है। लैला का मजनूँ की बुराई करना बताता है कि मशहूर आदर्श प्रेम-कथा में भी ईर्ष्या, स्वार्थ और बदनामी की बात घुस सकती है।

मिर्ज़ा ग़ालिब

आदमी जान के खाता है मोहब्बत में फ़रेब

ख़ुद-फ़रेबी ही मोहब्बत का सिला हो जैसे

इक़बाल अज़ीम

बच्चे फ़रेब खा के चटाई पे सो गए

इक माँ उबालती रही पथर तमाम रात

अब्दुल माजिद नश्तर जबलपुरी

मुझ को फ़रेब देने वाले

मैं तुझ पे यक़ीन कर चुका हूँ

अतहर नफ़ीस

हर दिल-फ़रेब चीज़ नज़र का ग़ुबार है

आँखें हसीन हों तो ख़िज़ाँ भी बहार है

अब्दुल हमीद अदम

रंग ही से फ़रेब खाते रहें

ख़ुशबुएँ आज़माना भूल गए

अंजुम लुधियानवी

जिन का मक़्सद फ़रेब होता है

वो बड़ी सादगी से मिलते हैं

चमन लाल चमन

ढूँढता फिरता है मुझ को क्यूँ फ़रेब-ए-रंग-ओ-बू

मैं वहाँ हूँ ख़ुद जहाँ अपना पता मिलता नहीं

अब्दुल्लतीफ़ शौक़

दूसरों को फ़रेब दे दे कर

हम ने ख़ुद भी फ़रेब खाया है

ज़की काकोरवी

शौक़ कितने फ़रेब देता है

मुस्कुरा कर हमारा नाम ले

निसार इटावी
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