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jis ke hote hue hote the zamāne mere

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ज़ीनत शायरी

गुलशन की फ़क़त फूलों से नहीं काँटों से भी ज़ीनत होती है

जीने के लिए इस दुनिया में ग़म की भी ज़रूरत होती है

सबा अफ़ग़ानी

है दसहरे में भी यूँ गर फ़रहत-ओ-ज़ीनत 'नज़ीर'

पर दिवाली भी अजब पाकीज़ा-तर त्यौहार है

नज़ीर अकबराबादी

मिरी ज़िंदगी की ज़ीनत हुई आफ़त-ओ-बला से

मैं वो ज़ुल्फ़-ए-ख़म-ब-ख़म हूँ जो सँवर गई हवा से

परवेज़ शाहिदी

मेरा कर्ब मिरी तन्हाई की ज़ीनत

मैं चेहरों के जंगल का सन्नाटा हूँ

अम्बर बहराईची

हुस्न बाज़ार की ज़ीनत है मगर है तो सही

घर से निकला हूँ तो उस चौक से भी हो आऊँ

शहज़ाद अहमद

बने हुए हैं अजाएब-घरों की ज़ीनत हम

पर अपने वास्ते अपना ही दर नहीं खुलता

फ़ानी जोधपूरी

हज़ार रंग के फूलों से बाग़ की ज़ीनत

बहार आई तो लाई है इतने हंगामे

अनीस सुलताना

जल्वा-गर दिल में ख़याल-ए-आरिज़-ए-जानाना था

घर की ज़ीनत थी कि ज़ीनत-बख़्श साहब-ख़ाना था

हबीब मूसवी

ज़ीनत-ए-अग़्यार कलियाँ हो गईं

ग़ैरत-ए-अहल-ए-चमन को क्या हुआ

नज़ीर दहक़ानी

अदा-ए-ख़ार से गुलशन की बढ़ गई ज़ीनत

अगरचे फूलों के दामन हैं तार तार अभी

अफ़रोज़ आलम
बोलिए