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वज़ीर अली सबा लखनवी

1795 - 1885 | लखनऊ, भारत

दिल में इक दर्द उठा आँखों में आँसू भर आए

बैठे बैठे हमें क्या जानिए क्या याद आया

बात भी आप के आगे ज़बाँ से निकली

लीजिए आए थे हम सोच के क्या क्या दिल में

आप ही अपने ज़रा जौर-ओ-सितम को देखें

हम अगर अर्ज़ करेंगे तो शिकायत होगी

करें आप वफ़ा हम को क्या

बेवफ़ा आप ही कहलाइएगा

कहते हैं मिरे दोस्त मिरा हाल देख कर

दुश्मन को भी ख़ुदा करे मुब्तला-ए-इश्क़

आदम से बाग़-ए-ख़ुल्द छुटा हम से कू-ए-यार

वो इब्तिदा-ए-रंज है ये इंतिहा-ए-रंज

क़ैद-ए-मज़हब वाक़ई इक रोग ही

आदमी को चाहिए आज़ाद हो

कलेजा काँपता है देख कर इस सर्द-मेहरी को

तुम्हारे घर में क्या आए कि हम कश्मीर में आए

इतनी तो दीद-ए-इश्क़ की तासीर देखिए

जिस सम्त देखिए तिरी तस्वीर देखिए

बाक़ी रहा फ़र्क़ ज़मीन आसमान में

अपना क़दम उठा लें अगर दरमियाँ से हम

मेरे बग़ल में रह के मुझी को क्या ज़लील

नफ़रत सी हो गई दिल-ए-ख़ाना-ख़राब से

तिरी तलाश में मह की तरह मैं फिरता हूँ

कहाँ तू रात को आफ़्ताब रहता है

हुआ धूप में भी कम हुस्न-ए-यार

कनहय्या बना वो जो सँवला गया

काबा बनाइए कि कलीसा बनाइए

दिल सा मकाँ हवाले किया है जनाब के

साकिन-ए-दैर हूँ इक बुत का हूँ बंदा ब-ख़ुदा

ख़ुद वो काफ़िर हैं जो कहते हैं मुसलमाँ मुझ को

उल्फ़त-ए-कूचा-ए-जानाँ ने किया ख़ाना-ख़राब

बरहमन दैर से का'बे से मुसलमाँ निकला

रोज़ शब फ़ुर्क़त-ए-जानाँ में बसर की हम ने

तुझ से कुछ काम गर्दिश-ए-दौराँ निकला

का'बे की सम्त सज्दा किया दिल को छोड़ कर

तो किस तरफ़ था ध्यान हमारा किधर गया

तुम्हारी ज़ुल्फ़ गिर्दाब-ए-नाफ़ तक पहुँची

हुई चश्मा-ए-हैवाँ से फ़ैज़-याब घटा

ख़ुद-रफ़्तगी है चश्म-ए-हक़ीक़त जो वा हुई

दरवाज़ा खुल गया तो मैं घर से निकल गया