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प्रेमचंद

1880 - 1936 | बनारस, भारत

प्रेमचंद

कहानी 63

लेख 13

उद्धरण 31

दौलत से आदमी को जो इज़्ज़त मिलती है वह उसकी नहीं, उसकी दौलत की इज़्ज़त होती है।

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मैं एक मज़दूर हूँ, जिस दिन कुछ लिख लूँ उस दिन मुझे रोटी खाने का कोई हक़ नहीं।

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सोने और खाने का नाम ज़िंदगी नहीं है। आगे बढ़ते रहने की लगन का नाम ज़िंदगी है।

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मायूसी मुम्किन को भी ना-मुम्किन बना देती है।

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शायरी का आला-तरीन फ़र्ज़ इन्सान को बेहतर बनाना है।

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aah ko chahiye ek umr asar hote tak SHAMSUR RAHMAN FARUQI

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