दशहरा पर शेर
दशहरे का त्योहार बुराई पर अच्छाई की जीत का जश्न है। इस त्योहार का जश्न चुनिंदा उर्दू शायरी के साथ मनाइए।
है राम के वजूद पे हिन्दोस्ताँ को नाज़
अहल-ए-नज़र समझते हैं उस को इमाम-ए-हिंद
Interpretation:
Rekhta AI
यह दोहा/शेर राम को पूरे देश के लिए गर्व और आदर का प्रतीक बताता है। “वजूद” का अर्थ है उनकी स्थायी मौजूदगी, जो संस्कृति और नैतिकता में दिखाई देती है। “अहल-ए-नज़र” यानी दूरदर्शी लोग, संकीर्ण भेदभाव से ऊपर उठकर उन्हें ‘इमाम-ए-हिंद’—देश का आध्यात्मिक मार्गदर्शक—समझते हैं। भाव श्रद्धा और एकता का है।
एक सीता की रिफ़ाक़त है तो सब कुछ पास है
ज़िंदगी कहते हैं जिस को राम का बन-बास है
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जो सुनते हैं कि तिरे शहर में दसहरा है
हम अपने घर में दिवाली सजाने लगते हैं
है दसहरे में भी यूँ गर फ़रहत-ओ-ज़ीनत 'नज़ीर'
पर दिवाली भी अजब पाकीज़ा-तर त्यौहार है
अब नाम नहीं काम का क़ाएल है ज़माना
अब नाम किसी शख़्स का रावन न मिलेगा
वही जीने की आज़ादी वही मरने की जल्दी है
दिवाली देख ली हम ने दसहरे कर लिए हम ने
क्या सितम करते हैं मिट्टी के खिलौने वाले
राम को रक्खे हुए बैठे हैं रावण के क़रीब
दर्द घनेरा हिज्र का सहरा घोर अंधेरा और यादें
राम निकाल ये सारे रावन मेरी राम कहानी से
अच्छों से पता चलता है इंसाँ को बुरों का
रावन का पता चल न सका राम से पहले
राम माशूक़ अगर होवे आशिक़
तोड़ दे सर रक़ीब रावण का
अब भी खड़ी है सोच में डूबी उजयालों का दान लिए
आज भी रेखा पार है रावण सीता को समझाए कौन
चाहत की भला कौन सुने राम-कहानी
इस शहर के सब लोग हैं बहरे उसे कहना
अम्माँ की बातों में आँखें सुख-दुख सपने सब तो हैं
राम-कहानी उस के पास कबिरा-बानी उस के पास
'नज़्र' फिर आया है इक रस्म निभाने का दिन
सज सँवर के सभी रावन को जलाने निकले
ये मंज़िल-ए-हक़ के दीवानो कुछ सोच करो कुछ कर गुज़रो
क्या जाने कब क्या कर गुज़रे ये वक़्त का रावन क्या कहिए
यहाँ लछमन की रेखा है न सीता है मगर फिर भी
बहुत फेरे हमारे घर के इक साधू लगाता है
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अदब इतना कि क़दमों में पड़े हैं
अना इतनी कि लंका ख़ाक कर दें
गुज़रा था अपने शहर से रावन फ़साद का
ज़ालिम मोहब्बतों की कथाएँ भी ले गया
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टैग्ज़: ज़ुल्मऔर 1 अन्य
न रावन है कहानी में न सीता ज़िंदगानी में
मगर बनवास फिर भी चल रहा है क्या किया जाए
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टैग्ज़: ज़िंदगीऔर 1 अन्य
जिस पाप की दुनिया में है रावन का बसेरा
उस स्वर्ग सी धरती पे कोई राम नहीं है
पल में मनुश है राम पुजारी पल में चेला रावन का
पाप और पुन के बीच का धागा देखो कितना कच्चा है
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टैग्ज़: गुनाहऔर 1 अन्य
दुनिया में हर बुराई का ख़त्मा भी साथ है
रावन के साथ साथ यहाँ राम भी तो है
तख़्त-ए-लंका दिया विभीषन को
जब हुआ क़त्ल रावण-ए-मक़हूर
अन्याय ने भर दी है बहुत आग दिलों में
लंका ही कहीं इस में जो जल जाए तो अच्छा
राम वो वही रहमान हैं सभी मक़ाम उस के
मुख़्तलिफ़ ज़बानों में मुख़्तलिफ़ हैं नाम उस के