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रद करें डाउनलोड शेर

दशहरा पर शेर

दशहरे का त्योहार बुराई पर अच्छाई की जीत का जश्न है। इस त्योहार का जश्न चुनिंदा उर्दू शायरी के साथ मनाइए।

है राम के वजूद पे हिन्दोस्ताँ को नाज़

अहल-ए-नज़र समझते हैं उस को इमाम-ए-हिंद

Interpretation: Rekhta AI

यह दोहा/शेर राम को पूरे देश के लिए गर्व और आदर का प्रतीक बताता है। “वजूद” का अर्थ है उनकी स्थायी मौजूदगी, जो संस्कृति और नैतिकता में दिखाई देती है। “अहल-ए-नज़र” यानी दूरदर्शी लोग, संकीर्ण भेदभाव से ऊपर उठकर उन्हें ‘इमाम-ए-हिंद’—देश का आध्यात्मिक मार्गदर्शक—समझते हैं। भाव श्रद्धा और एकता का है।

अल्लामा इक़बाल

एक सीता की रिफ़ाक़त है तो सब कुछ पास है

ज़िंदगी कहते हैं जिस को राम का बन-बास है

हफ़ीज़ बनारसी

जो सुनते हैं कि तिरे शहर में दसहरा है

हम अपने घर में दिवाली सजाने लगते हैं

जमुना प्रसाद राही

है दसहरे में भी यूँ गर फ़रहत-ओ-ज़ीनत 'नज़ीर'

पर दिवाली भी अजब पाकीज़ा-तर त्यौहार है

नज़ीर अकबराबादी

अब नाम नहीं काम का क़ाएल है ज़माना

अब नाम किसी शख़्स का रावन मिलेगा

अनवर जलालपुरी

वही जीने की आज़ादी वही मरने की जल्दी है

दिवाली देख ली हम ने दसहरे कर लिए हम ने

साक़ी फ़ारुक़ी

क्या सितम करते हैं मिट्टी के खिलौने वाले

राम को रक्खे हुए बैठे हैं रावण के क़रीब

होश जौनपुरी

दर्द घनेरा हिज्र का सहरा घोर अंधेरा और यादें

राम निकाल ये सारे रावन मेरी राम कहानी से

सय्यद सरोश आसिफ़

क़दम क़दम हैं रावन लेकिन

निर्बल के बस राम बहुत हैं

सब बिलग्रामी

अच्छों से पता चलता है इंसाँ को बुरों का

रावन का पता चल सका राम से पहले

रिज़वान बनारसी

राम माशूक़ अगर होवे आशिक़

तोड़ दे सर रक़ीब रावण का

अब्दुल वहाब यकरू

अब भी खड़ी है सोच में डूबी उजयालों का दान लिए

आज भी रेखा पार है रावण सीता को समझाए कौन

अज़ीज़ बानो दाराब वफ़ा

चाहत की भला कौन सुने राम-कहानी

इस शहर के सब लोग हैं बहरे उसे कहना

रियाज़ शाहिद

अम्माँ की बातों में आँखें सुख-दुख सपने सब तो हैं

राम-कहानी उस के पास कबिरा-बानी उस के पास

प्रताप सोमवंशी

'नज़्र' फिर आया है इक रस्म निभाने का दिन

सज सँवर के सभी रावन को जलाने निकले

नज़्र फ़ातमी

ये मंज़िल-ए-हक़ के दीवानो कुछ सोच करो कुछ कर गुज़रो

क्या जाने कब क्या कर गुज़रे ये वक़्त का रावन क्या कहिए

पंडित विद्या रतन आसी

यहाँ लछमन की रेखा है सीता है मगर फिर भी

बहुत फेरे हमारे घर के इक साधू लगाता है

राहत इंदौरी

अदब इतना कि क़दमों में पड़े हैं

अना इतनी कि लंका ख़ाक कर दें

शाद सिद्दीक़ी

गुज़रा था अपने शहर से रावन फ़साद का

ज़ालिम मोहब्बतों की कथाएँ भी ले गया

फ़ारूक़ अंजुम

रावन है कहानी में सीता ज़िंदगानी में

मगर बनवास फिर भी चल रहा है क्या किया जाए

हमज़ा बिलाल

जिस पाप की दुनिया में है रावन का बसेरा

उस स्वर्ग सी धरती पे कोई राम नहीं है

गौहर शेख़ पूर्वी

रावण रात जगाता है

कोई राम-कहानी दे

अमीर क़ज़लबाश

पल में मनुश है राम पुजारी पल में चेला रावन का

पाप और पुन के बीच का धागा देखो कितना कच्चा है

सय्यद आशूर काज़मी

किस से पूछूँ खो गई सीता कहाँ

बन का हर साया ही रावन हो गया

वजद चुगताई

दुनिया में हर बुराई का ख़त्मा भी साथ है

रावन के साथ साथ यहाँ राम भी तो है

अबू हुरैरा अब्बासी

खींचते हो हर जानिब किस लिए लकीरें सी

मैं कोई रावन हूँ मैं कोई सीता हूँ

रमेश तन्हा

तख़्त-ए-लंका दिया विभीषन को

जब हुआ क़त्ल रावण-ए-मक़हूर

सरदार गंडा सिंह मशरिक़ी

अन्याय ने भर दी है बहुत आग दिलों में

लंका ही कहीं इस में जो जल जाए तो अच्छा

आलोक यादव

राम वो वही रहमान हैं सभी मक़ाम उस के

मुख़्तलिफ़ ज़बानों में मुख़्तलिफ़ हैं नाम उस के

रवेन्द्र जैन
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