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अब्दुल रहमान एहसान देहलवी

1769 - 1851 | दिल्ली, भारत

मुग़ल बादशाह शाह आलम सानी के उस्ताद, मीर तक़ी मीर के बाद के शायरों के समकालीन

मुग़ल बादशाह शाह आलम सानी के उस्ताद, मीर तक़ी मीर के बाद के शायरों के समकालीन

ग़ज़ल 37

शेर 47

नमाज़ अपनी अगरचे कभी क़ज़ा हुई

अदा किसी की जो देखी तो फिर अदा हुई

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गले से लगते ही जितने गिले थे भूल गए

वगर्ना याद थीं हम को शिकायतें क्या क्या

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ब-वक़्त-ए-बोसा-ए-लब काश ये दिल कामराँ होता

ज़बाँ उस बद-ज़बाँ की मुँह में और मैं ज़बाँ होता

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रुबाई 3

 

पुस्तकें 1

कुल्लियात-ए-एहसान

 

1968

 

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