Akhtar Razaa Saleemi's Photo'

अख़्तर रज़ा सलीमी

1974 | इस्लामाबाद, पाकिस्तान

ग़ज़ल 9

शेर 13

गुज़र रहा हूँ किसी जन्नत-ए-जमाल से मैं

गुनाह करता हुआ नेकियाँ कमाता हुआ

अब ज़मीं भी जगह नहीं देती

हम कभी आसमाँ पे रहते थे

ख़्वाब गलियों में फिर रहे थे और

लोग अपने घरों में सोए थे

इक आग हमारी मुंतज़िर है

इक आग से हम निकल रहे हैं

पहले तराशा काँच से उस ने मिरा वजूद

फिर शहर भर के हाथ में पत्थर थमा दिए

  • शेयर कीजिए

"इस्लामाबाद" के और शायर

  • अहमद फ़राज़ अहमद फ़राज़
  • इफ़्तिख़ार आरिफ़ इफ़्तिख़ार आरिफ़
  • ऐतबार साजिद ऐतबार साजिद
  • सय्यद ज़मीर जाफ़री सय्यद ज़मीर जाफ़री
  • सरफ़राज़ ज़ाहिद सरफ़राज़ ज़ाहिद
  • अनवर मसूद अनवर मसूद
  • ज़िया जालंधरी ज़िया जालंधरी
  • हारिस ख़लीक़ हारिस ख़लीक़
  • नूर बिजनौरी नूर बिजनौरी
  • तारिक़ नईम तारिक़ नईम