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अख़्तर रज़ा सलीमी

1974 | इस्लामाबाद, पाकिस्तान

ग़ज़ल 9

नज़्म 1

 

शेर 13

अब ज़मीं भी जगह नहीं देती

हम कभी आसमाँ पे रहते थे

गुज़र रहा हूँ किसी जन्नत-ए-जमाल से मैं

गुनाह करता हुआ नेकियाँ कमाता हुआ

ख़्वाब गलियों में फिर रहे थे और

लोग अपने घरों में सोए थे

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