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बशीर दुर्रानी

1902 | कराची, पाकिस्तान

शेर 1

दुश्मन-ए-दिल ही नहीं दुश्मन-ए-जाँ होता है

उफ़ वो एहसास जो पीरी में जवाँ होता है

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