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चन्द्रभान ख़याल

1946 | दिल्ली, भारत

नज़्म के जाने माने शायर

नज़्म के जाने माने शायर

चन्द्रभान ख़याल

ग़ज़ल 17

नज़्म 16

अशआर 20

पास से देखा तो जाना किस क़दर मग़्मूम हैं

अन-गिनत चेहरे कि जिन को शादमाँ समझा था मैं

वक़्त और हालात पर क्या तब्सिरा कीजे कि जब

एक उलझन दूसरी उलझन को सुलझाने लगे

इंसान की दुनिया में इंसाँ है परेशाँ क्यूँ

मछली तो नहीं होती बेचैन कभी जल में

हमारे घर के आँगन में सितारे बुझ गए लाखों

हमारी ख़्वाब गाहों में चमका सुब्ह का सूरज

सुब्ह आती है दबे पाँव चली जाती है

घेर लेता है मुझे शाम ढले सन्नाटा

पुस्तकें 7

 

ऑडियो 5

अगर क़रीब से देखो

आज फिर दर्द उठा

क़तरा क़तरा एहसास

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aah ko chahiye ek umr asar hote tak SHAMSUR RAHMAN FARUQI

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