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ग़ुलाम नबी हकीम

1901 | लंदन, यूनाइटेड किंगडम

ग़ज़ल 2

 

शेर 2

तिरी हस्ती से क़ाएम है ये हस्ती

ये हस्ती ख़ुद कोई हस्ती नहीं है

ज़िंदगी इश्क़-ओ-मोहब्बत से जवाँ होती है

वर्ना बे-कैफ़ सी बे-ताब-ओ-तवाँ होती है

 

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