हफ़ीज़ शाहिद
ग़ज़ल 35
नज़्म 1
अशआर 3
जीने का हौसला भी मयस्सर न हो जिसे
उस की सहर भी शाम-ए-ग़रीबाँ से कम नहीं
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यादों में हैं गुलाब से चेहरे सजे हुए
शहर-ए-ख़याल कूचा-ए-जानाँ से कम नहीं
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'शाहिद' फ़िराक़-ए-याद में ये दिल का हाल है
वीरानियों में दश्त-ओ-बयाबाँ से कम नहीं
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