ग़ज़ल 9

नज़्म 1

 

शेर 9

अश्कों में पिरो के उस की यादें

पानी पे किताब लिख रहा हूँ

सब उम्मीदें मिरे आशोब-ए-तमन्ना तक थीं

बस्तियाँ हो गईं ग़र्क़ाब तो दरिया उतरा

कुछ कुछ तो होता है इक तिरे होने से

वर्ना ऐसी बातों पर कौन हाथ मलता है

पुस्तकें 2

Irtiqa

Kitabi Silsila Number-030

2001

Urdu Journalism

 

 

 

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