ग़ज़ल 11

शेर 9

अश्कों में पिरो के उस की यादें

पानी पे किताब लिख रहा हूँ

सब उम्मीदें मिरे आशोब-ए-तमन्ना तक थीं

बस्तियाँ हो गईं ग़र्क़ाब तो दरिया उतरा

दिल की दहलीज़ पे जब शाम का साया उतरा

उफ़ुक़-ए-दर्द से सीने में उजाला उतरा

याद-ए-याराँ दिल में आई हूक बन कर रह गई

जैसे इक ज़ख़्मी परिंदा जिस के पर टूटे हुए

ख़ुदा इंसान की तक़्सीम-दर-तक़्सीम देख

पारसाओं देवताओं क़ातिलों के दरमियाँ

पुस्तकें 2

Irtiqa

Kitabi Silsila Number-030

2001

Urdu Journalism

 

 

 

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