ग़ज़ल 4

 

शेर 4

आह ये बरसात का मौसम ये ज़ख़्मों की बहार

हो गया है ख़ून-ए-दिल आँखों से जारी इन दिनों

निगाह-ए-शौक़ अगर दिल की तर्जुमाँ हो जाए

तो ज़र्रा ज़र्रा मोहब्बत का राज़-दाँ हो जाए

चमन वही है घटाएँ वही बहार वही

मगर गुलों में वो अब रंग-ओ-बू नहीं बाक़ी

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