Jaan Nisar Akhtar's Photo'

जाँ निसार अख़्तर

1914 - 1976 | मुंबई, भारत

महत्वपूर्ण प्रगतिशील शायर और फ़िल्म गीतकार। फ़िल्म गीतकार जावेद अख़्तर के पिता

महत्वपूर्ण प्रगतिशील शायर और फ़िल्म गीतकार। फ़िल्म गीतकार जावेद अख़्तर के पिता

ग़ज़ल 44

शेर 30

ये इल्म का सौदा ये रिसाले ये किताबें

इक शख़्स की यादों को भुलाने के लिए हैं

और क्या इस से ज़ियादा कोई नर्मी बरतूँ

दिल के ज़ख़्मों को छुआ है तिरे गालों की तरह

लोग कहते हैं कि तू अब भी ख़फ़ा है मुझ से

तेरी आँखों ने तो कुछ और कहा है मुझ से

सौ चाँद भी चमकेंगे तो क्या बात बनेगी

तुम आए तो इस रात की औक़ात बनेगी

अब ये भी नहीं ठीक कि हर दर्द मिटा दें

कुछ दर्द कलेजे से लगाने के लिए हैं

क़ितआ 30

पुस्तकें 39

Ghar Aangan

रुबाइयाँ

1976

Ghar Aangan

रुबाइयाँ

1971

Hamari Qadr Karo Ai Sukhan Ke Matwalo

Jaan nisar Akhtar Par Kuch Mazamen

2011

हिन्दुस्ताँ हमारा

खण्ड-001

1973

हिन्दुस्ताँ हमारा

खण्ड-002

1974

हिन्दोस्तां हमारा

Volume-001

2006

Jaan Nisar Akhtar

Shakhs Aur Shair

1987

Jan Nisar Akhtar

Urdu Shairon Ka Intikhabi Silsila

1957

जां निसार अख़्तर :हयात-ओ-फ़न

 

1977

जाँ निसार अख़्तर की शायरी

 

1983

चित्र शायरी 22

ज़िंदगी तुझ को भुलाया है बहुत दिन हम ने वक़्त ख़्वाबों में गँवाया है बहुत दिन हम ने अब ये नेकी भी हमें जुर्म नज़र आती है सब के ऐबों को छुपाया है बहुत दिन हम ने तुम भी इस दिल को दुखा लो तो कोई बात नहीं अपना दिल आप दुखाया है बहुत दिन हम ने मुद्दतों तर्क-ए-तमन्ना पे लहू रोया है इश्क़ का क़र्ज़ चुकाया है बहुत दिन हम ने क्या पता हो भी सके इस की तलाफ़ी कि नहीं शायरी तुझ को गँवाया है बहुत दिन हम ने

कुचल के फेंक दो आँखों में ख़्वाब जितने हैं इसी सबब से हैं हम पर अज़ाब जितने हैं

आहट सी कोई आए तो लगता है कि तुम हो साया कोई लहराए तो लगता है कि तुम हो जब शाख़ कोई हाथ लगाते ही चमन में शरमाए लचक जाए तो लगता है कि तुम हो संदल से महकती हुई पुर-कैफ़ हवा का झोंका कोई टकराए तो लगता है कि तुम हो ओढ़े हुए तारों की चमकती हुई चादर नद्दी कोई बल खाए तो लगता है कि तुम हो जब रात गए कोई किरन मेरे बराबर चुप-चाप सी सो जाए तो लगता है कि तुम हो

वीडियो 20

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वीडियो का सेक्शन
शायर अपना कलाम पढ़ते हुए
जब लगें ज़ख़्म तो क़ातिल को दुआ दी जाए

जाँ निसार अख़्तर

ज़िंदगी ये तो नहीं तुझ को सँवारा ही न हो

जाँ निसार अख़्तर

तुलू-ए-सुब्ह है नज़रें उठा के देख ज़रा

जाँ निसार अख़्तर

हम ने काटी हैं तिरी याद में रातें अक्सर

जाँ निसार अख़्तर

ऑडियो 31

अशआ'र मिरे यूँ तो ज़माने के लिए हैं

अच्छा है उन से कोई तक़ाज़ा किया न जाए

अशआ'र मिरे यूँ तो ज़माने के लिए हैं

Recitation

aah ko chahiye ek umr asar hote tak SHAMSUR RAHMAN FARUQI

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