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जमील नज़र

1925 - 1993 | कराची, पाकिस्तान

ग़ज़ल 4

 

शेर 5

अपने बारे में जब भी सोचा है

उस का चेहरा नज़र में उभरा है

क़ुर्ब-ए-ज़ात ही हासिल ज़ख्म-ए-रुस्वाई

अजीब लगता है अब ख़ुद से राब्ता रखना

देखिए तो है कारवाँ वर्ना

हर मुसाफ़िर सफ़र में तन्हा है

ई-पुस्तक 2

Ghazal Chehra

 

1980

Muqaddma-e-Sehr-o-Saheri

 

 

 

"कराची" के और शायर

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