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जमील नज़र

1925 - 1993 | कराची, पाकिस्तान

ग़ज़ल 4

 

शेर 5

अपने बारे में जब भी सोचा है

उस का चेहरा नज़र में उभरा है

बे-वफ़ा ही सही ज़माने में

हम किसी फ़न की इंतिहा तो हुए

देखिए तो है कारवाँ वर्ना

हर मुसाफ़िर सफ़र में तन्हा है

पुस्तकें 2

Ghazal Chehra

 

1980

Muqaddma-e-Sehr-o-Saheri

 

 

 

"कराची" के और शायर

  • साबिर वसीम साबिर वसीम
  • कौसर  नियाज़ी कौसर नियाज़ी
  • इशरत रूमानी इशरत रूमानी
  • अदीब सहारनपुरी अदीब सहारनपुरी
  • सिराज मुनीर सिराज मुनीर
  • अदा जाफ़री अदा जाफ़री
  • क़मर जमील क़मर जमील
  • अहमद हमदानी अहमद हमदानी
  • उम्मीद फ़ाज़ली उम्मीद फ़ाज़ली
  • अदीब सुहैल अदीब सुहैल