ग़ज़ल 15

शेर 5

अपने बारे में जब भी सोचा है

उस का चेहरा नज़र में उभरा है

देखिए तो है कारवाँ वर्ना

हर मुसाफ़िर सफ़र में तन्हा है

बे-वफ़ा ही सही ज़माने में

हम किसी फ़न की इंतिहा तो हुए

क़ुर्ब-ए-ज़ात ही हासिल ज़ख्म-ए-रुस्वाई

अजीब लगता है अब ख़ुद से राब्ता रखना

बड़ा अजीब है तहज़ीब-ए-इर्तिक़ा के लिए

तमाम उम्र किसी इक को हम-नवा रखना

पुस्तकें 2

Ghazal Chehra

 

1980

Muqaddma-e-Sehr-o-Saheri

 

 

 

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