ग़ज़ल 4

 

शेर 5

अपने बारे में जब भी सोचा है

उस का चेहरा नज़र में उभरा है

बे-वफ़ा ही सही ज़माने में

हम किसी फ़न की इंतिहा तो हुए

देखिए तो है कारवाँ वर्ना

हर मुसाफ़िर सफ़र में तन्हा है

पुस्तकें 2

Ghazal Chehra

 

1980

Muqaddma-e-Sehr-o-Saheri

 

 

 

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