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मंज़ूर हाशमी

1935 - 2008 | अलीगढ़, भारत

मंज़ूर हाशमी

ग़ज़ल 18

अशआर 27

क़ुबूल कैसे करूँ उन का फ़ैसला कि ये लोग

मिरे ख़िलाफ़ ही मेरा बयान माँगते हैं

यक़ीन हो तो कोई रास्ता निकलता है

हवा की ओट भी ले कर चराग़ जलता है

सुना है सच्ची हो नीयत तो राह खुलती है

चलो सफ़र करें कम से कम इरादा करें

इक ज़माना है हवाओं की तरफ़

मैं चराग़ों की तरफ़ हो जाऊँ

कभी कभी तो किसी अजनबी के मिलने पर

बहुत पुराना कोई सिलसिला निकलता है

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शायर अपना कलाम पढ़ते हुए
At a mushaira

मंज़ूर हाशमी

Reading some sher at a mushaira

मंज़ूर हाशमी

wo teer chhoda hua to usi kamaan ka tha

मंज़ूर हाशमी

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Recitation

aah ko chahiye ek umr asar hote tak SHAMSUR RAHMAN FARUQI

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