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रहमतुल्लाह ख़ाँ

1930 - 2005 | इस्लामाबाद, पाकिस्तान

शेर 4

आँख देखे बिना नहीं रहती

होंट तो ख़ैर सी लिए हम ने

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अदावतों के लिए मेरे पास वक़्त कहाँ

मोहब्बतों के लिए ही ये ज़िंदगी कम है

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हज़ारों बार तेरा ख़त पढ़ा है

कि इन लफ़्ज़ों के पीछे क्या लिखा है

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इक सिरा उलझी हुई डोर का हाथ आया है

दूसरे तक भी पहुँच जाऊँगा सुलझाते हुए

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