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सहबा लखनवी

1919 - 2002 | कराची, पाकिस्तान

सहबा लखनवी

ग़ज़ल 4

 

नज़्म 6

अशआर 3

कारवाँ के चलने से कारवाँ के रुकने तक

मंज़िलें नहीं यारो रास्ते बदलते हैं

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मौज मौज तूफ़ाँ है मौज मौज साहिल है

कितने डूब जाते हैं कितने बच निकलते हैं

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कितने दीप बुझते हैं कितने जलते हैं

अज़्म-ए-ज़िंदगी ले कर फिर भी लोग चलते हैं

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Recitation

aah ko chahiye ek umr asar hote tak SHAMSUR RAHMAN FARUQI