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सलीम अहमद

1927 - 1983 | कराची, पाकिस्तान

पाकिस्तान के प्रमुखतम आलोचकों में विख्यात/ऐंटी-गज़ल रूझान और आधुनिकता-विरोधी विचारों के लिए प्रसिद्ध

पाकिस्तान के प्रमुखतम आलोचकों में विख्यात/ऐंटी-गज़ल रूझान और आधुनिकता-विरोधी विचारों के लिए प्रसिद्ध

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निकल गए हैं जो बादल बरसने वाले थे

ये शहर आब को तरसेगा चश्म-ए-तर के बग़ैर

दर-ब-दर ठोकरें खाईं तो ये मालूम हुआ

घर किसे कहते हैं क्या चीज़ है बे-घर होना

उस एक चेहरे में आबाद थे कई चेहरे

उस एक शख़्स में किस किस को देखता था मैं

दुख दे या रुस्वाई दे

ग़म को मिरे गहराई दे

चली है मौज में काग़ज़ की कश्ती

उसे दरिया का अंदाज़ा नहीं है

घास में जज़्ब हुए होंगे ज़मीं के आँसू

पाँव रखता हूँ तो हल्की सी नमी लगती है

ख़मोशी के हैं आँगन और सन्नाटे की दीवारें

ये कैसे लोग हैं जिन को घरों से डर नहीं लगता

देवता बनने की हसरत में मुअल्लक़ हो गए

अब ज़रा नीचे उतरिए आदमी बन जाइए

मोहल्ले वाले मेरे कार-ए-बे-मसरफ़ पे हँसते हैं

मैं बच्चों के लिए गलियों में ग़ुब्बारे बनाता हूँ

इतनी काविश भी कर मेरी असीरी के लिए

तू कहीं मेरा गिरफ़्तार समझा जाए

सच तो कह दूँ मगर इस दौर के इंसानों को

बात जो दिल से निकलती है बुरी लगती है

कैसे क़िस्से थे कि छिड़ जाएँ तो उड़ जाती थी नींद

क्या ख़बर थी वो भी हर्फ़-ए-मुख़्तसर हो जाएँगे

मंज़िल का पता है किसी राहगुज़र का

बस एक थकन है कि जो हासिल है सफ़र का

सख़्त बीवी को शिकायत है जवान-ए-नौ से

रेल चलती नहीं गिर जाता है पहले सिगनल

कोई नहीं जो पता दे दिलों की हालत का

कि सारे शहर के अख़बार हैं ख़बर के बग़ैर

मैं तुझ को कितना चाहता हूँ

ये कहना ग़ैर-ज़रूरी है

जाने शेर में किस दर्द का हवाला था

कि जो भी लफ़्ज़ था वो दिल दुखाने वाला था

मुझ से कहता है कि साए की तरह साथ हैं हम

यूँ मिलने का निकाला है बहाना कैसा

साथ उस के रह सके बग़ैर उस के रह सके

ये रब्त है चराग़ का कैसा हवा के साथ

वो जुनूँ को बढ़ाए जाएँगे

उन की शोहरत है मेरी रुस्वाई

इक पतिंगे ने ये अपने रक़्स-ए-आख़िर में कहा

रौशनी के साथ रहिए रौशनी बन जाइए

ख़ुद अपनी दीद से अंधी हैं आँखें

ख़ुद अपनी गूँज से बहरा हुआ हूँ

वो बे-ख़ुदी थी मोहब्बत की बे-रुख़ी तो थी

पे उस को तर्क-ए-तअ'ल्लुक़ को इक बहाना हुआ

ये चाहा था कि पत्थर बन के जी लूँ

सो अंदर से पिघलता जा रहा हूँ

नहीं रहा मैं तिरे रास्ते का पत्थर भी

वो दिन भी थे तिरे एहसास में ख़ुदा था मैं

जितना आँख से कम देखूँ

उतनी दूर दिखाई दे

और तो क्या दिया बहारों ने

बस यही चार दिन की रुस्वाई

मैं ग़म को बसा रहा हूँ दिल में

बे-घर को मकान दे रहा हूँ

दिल हुस्न को दान दे रहा हूँ

गाहक को दुकान दे रहा हूँ

बार-हा यूँ भी हुआ तेरी मोहब्बत की क़सम

जान कर हम ने तुझे ख़ुद से ख़फ़ा रक्खा है

किसी को क्या बताऊँ कौन हूँ मैं

कि अपनी दास्ताँ भूला हुआ हूँ

याद ने कर यकायक पर्दा खींचा दूर तक

मैं भरी महफ़िल में बैठा था कि तन्हा हो गया

रस्म-ए-जहाँ छूट सकी तर्क-ए-इश्क़ से

जब मिल गए तो पुर्सिश-ए-हालात हो गई

साए को साए में गुम होते तो देखा होगा

ये भी देखो कि तुम्हें हम ने भुलाया कैसे

के अब जंगल में ये उक़्दा खुला

भेड़ीए पढ़ते नहीं हैं फ़ल्सफ़ा

हाल-ए-दिल ना-गुफ़्तनी है हम जो कहते भी तो क्या

फिर भी ग़म ये है कि उस ने हम से पूछा ही नहीं

घर में कुछ कम है ये एहसास भी होता है 'सलीम'

ये भी खुलता नहीं किस शय की कमी लगती है

दिल के लेने से 'सलीम' उस को नहीं है इंकार

लेकिन इस तरह कि इक़रार समझा जाए

हम ने शिकवा कभी किया करें

शिकवा है ए'तिराफ़ नाकामी

दिल जो इस बज़्म में आता है तो जाता ही नहीं

एक दिन देखना दीवाना हुआ रक्खा है

ख़ुश-नुमा लफ़्ज़ों की रिश्वत दे के राज़ी कीजिए

रूह की तौहीन पर आमादा रहता है बदन

आँसुओं से तू है ख़ाली दर्द से आरी हूँ मैं

तेरी आँखें काँच की हैं मेरा दिल पत्थर का है

दश्त दर ख़ैर मनाएँ कि अभी वहशत में

इश्क़ ने पहला क़दम नाम-ए-ख़ुदा रक्खा है

हाल-ए-दिल कौन सुनाए उसे फ़ुर्सत किस को

सब को इस आँख ने बातों में लगा रक्खा है

क़िस्सा छेड़ा मेहर वफ़ा का अव्वल-ए-शब उन आँखों ने

रात कटी और उम्र गुज़ारी फिर भी बात अधूरी थी

मुझे हर्फ़-ए-ग़लत समझा था तू ने

सो मैं मअ'नी का दफ़्तर हो गया हूँ

वो मिरे दिल की रौशनी वो मिरे दाग़ ले गई

ऐसी चली हवा-ए-शाम सारे चराग़ ले गई

ये कैसे लोग हैं सदियों की वीरानी में रहते हैं

इन्हें कमरों की बोसीदा छतों से डर नहीं लगता

ये नहीं है कि नवाज़े गए हों हम लोग

हम को सरकार से तमग़ा मिला रुस्वाई का

बहुत तवील मिरी दास्तान-ए-ग़म थी मगर

ग़ज़ल से काम लिया मुख़्तसर बनाने का