ग़ज़ल 4

 

शेर 7

मैं दे रहा हूँ तुझे ख़ुद से इख़्तिलाफ़ का हक़

ये इख़्तिलाफ़ का हक़ है मुख़ालिफ़त का नहीं

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उस के कमरे से उठा लाया हूँ यादें अपनी

ख़ुद पड़ा रह गया लेकिन किसी अलमारी में

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मेरा ये दुख कि मैं सिक्का हूँ गए वक़्तों का

तेरा हो कर भी तिरे काम नहीं सकता

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पुस्तकें 1

Kahani

 

2008

 

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