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कलीम उस्मानी

1928 - 2000 | लाहौर, पाकिस्तान

ग़ज़ल 4

 

शेर 2

जब किसी ने क़द गेसू का फ़साना छेड़ा

बात बढ़ के रसन-ओ-दार तक पहुँची है

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है ज़ेब-ए-गुलू कब से मिरे दार का फंदा

मुजरिम हूँ अगर मैं तो सज़ा क्यूँ नहीं देते

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