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तौक़ीर तक़ी

कराची, पाकिस्तान

ग़ज़ल 11

शेर 16

रूठ कर आँख के अंदर से निकल जाते हैं

अश्क बच्चों की तरह घर से निकल जाते हैं

बदन में रूह की तर्सील करने वाले लोग

बदल गए मुझे तब्दील करने वाले लोग

हमारी राह में बैठेगी कब तक तेरी दुनिया

कभी तो इस ज़ुलेख़ा की जवानी ख़त्म होगी

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