ग़ज़ल 11

शेर 16

बदन में रूह की तर्सील करने वाले लोग

बदल गए मुझे तब्दील करने वाले लोग

फेंक दे ख़ुश्क फूल यादों के

ज़िद कर तू भी बे-वफ़ा हो जा

रूठ कर आँख के अंदर से निकल जाते हैं

अश्क बच्चों की तरह घर से निकल जाते हैं

जैसे वीरान हवेली में हों ख़ामोश चराग़

अब गुज़रती हैं तिरे शहर में शामें ऐसी

लफ़्ज़ की क़ैद से रिहा हो जा

मिरी आँख से अदा हो जा

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