उमर फ़ारूक़

नज़्म 1

 

शेर 6

उट्ठे जो तेरे दर से तो दुनिया सिमट गई

बैठे थे तेरे दर पे ज़माना लिए हुए

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बदन का बोझ उठाना भी अब मुहाल हुआ

जो ख़ुद से हार के बैठे तो फिर ये हाल हुआ

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मुझे ख़रीद रहे हैं मिरे सभी अपने

मैं बिक तो जाऊँ मगर सामने तो आए कोई

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मिरे मालिक मुझे इस ख़ाक से बे-घर करना

मोहब्बत के सफ़र में चलते चलते थक गया हूँ मैं

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हमें तो टूटी हुई कश्तियाँ नहीं दिखतीं

हमारे घर से ही दरिया दिखाई देता है

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पुस्तकें 1

Istilahat-e-Naqd-o-Adab

 

2004

 

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