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वहीद अख़्तर

1935 - 1996 | अलीगढ़, भारत

अग्रणी आधुनिक शायरों और आलोचकों में विख्यात।

अग्रणी आधुनिक शायरों और आलोचकों में विख्यात।

वहीद अख़्तर

ग़ज़ल 26

नज़्म 9

अशआर 24

माँगने वालों को क्या इज़्ज़त रुस्वाई से

देने वालों की अमीरी का भरम खुलता है

जो सुनना चाहो तो बोल उट्ठेंगे अँधेरे भी

सुनना चाहो तो दिल की सदा सुनाई दे

हज़ारों साल सफ़र कर के फिर वहीं पहुँचे

बहुत ज़माना हुआ था हमें ज़मीं से चले

तू ग़ज़ल बन के उतर बात मुकम्मल हो जाए

मुंतज़िर दिल की मुनाजात मुकम्मल हो जाए

उम्र भर मिलते रहे फिर भी मिलने पाए

इस तरह मिल कि मुलाक़ात मुकम्मल हो जाए

पुस्तकें 14

ऑडियो 10

ज़बान-ए-ख़ल्क़ पे आया तो इक फ़साना हुआ

जिस को माना था ख़ुदा ख़ाक का पैकर निकला

तू ग़ज़ल बन के उतर बात मुकम्मल हो जाए

Recitation

aah ko chahiye ek umr asar hote tak SHAMSUR RAHMAN FARUQI

"अलीगढ़" के और शायर

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aah ko chahiye ek umr asar hote tak SHAMSUR RAHMAN FARUQI

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