noImage

वली उज़लत

1692 - 1775 | हैदराबाद, भारत

उर्दू शायरी को परम्परा निर्माण करने वाले अग्रणी शायरों में शामिल

उर्दू शायरी को परम्परा निर्माण करने वाले अग्रणी शायरों में शामिल

वली उज़लत

ग़ज़ल 58

अशआर 28

सख़्त पिस्ताँ तिरे चुभे दिल में

अपने हाथों से मैं ख़राब हुआ

  • शेयर कीजिए

सिया है ज़ख़्म-ए-बुलबुल गुल ने ख़ार और बोईगुलशन से

सूई तागा हमारे चाक-ए-दिल का है कहाँ देखें

तिरी ज़ुल्फ़ की शब का बेदार मैं हूँ

तुझ आँखों के साग़र का मय-ख़्वार मैं हूँ

  • शेयर कीजिए

सहज याद गया वो लाल होली-बाज़ जूँ दिल में

गुलाली हो गया तन पर मिरे ख़िर्क़ा जो उजला था

  • शेयर कीजिए

हिन्दू मुस्लिमीन हैं हिर्स-ओ-हवा-परसत

हो आश्ना-परस्त वही है ख़ुदा-परस्त

  • शेयर कीजिए

पुस्तकें 2

 

ऑडियो 8

आज दिल बे-क़रार है मेरा

ख़त ने आ कर की है शायद रहम फ़रमाने की अर्ज़

ग़ैर-ए-आह-ए-सर्द नहीं दाग़ों के जाने का इलाज

Recitation

aah ko chahiye ek umr asar hote tak SHAMSUR RAHMAN FARUQI

संबंधित ब्लॉग

 

संबंधित शायर

"हैदराबाद" के और शायर

Recitation

aah ko chahiye ek umr asar hote tak SHAMSUR RAHMAN FARUQI

बोलिए