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नज़्म
क़व्वाली
जो हलवा रख के अलमारी में आपी बंद करती हैं
खिलाती हैं न खाती हैं पड़ा बर्बाद होता है
मुश्ताक़ अहमद नूरी
ग़ज़ल
नज़ीर अकबराबादी
ग़ज़ल
मेरे बाबा मेरी अम्माँ मेरी आपी के सिवा
है मिला इंसाफ़ भी मुझ को यहाँ तो क्या हुआ














