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शम्सुर रहमान फ़ारूक़ी
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नज़्म
बहार बन के चली आ कि जा रही है बहार
रबाब-ए-इश्क़ हैं लर्ज़ां है इक तराना-ए-नाज़
जमी हुई है अभी महफ़िल-ए-शबाना-ए-नाज़
सय्यद आबिद अली आबिद
ग़ज़ल
तू ख़ुदा है न मिरा इश्क़ फ़रिश्तों जैसा
दोनों इंसाँ हैं तो क्यूँ इतने हिजाबों में मिलें
अहमद फ़राज़
नज़्म
हमेशा देर कर देता हूँ
उसे आवाज़ देनी हो उसे वापस बुलाना हो
हमेशा देर कर देता हूँ मैं











