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इश्क़ औरंगाबादी

ग़ज़ल 39

शेर 18

आईना कभी क़ाबिल-ए-दीदार होवे

गर ख़ाक के साथ उस को सरोकार होवे

मज़ा आब-ए-बक़ा का जान-ए-जानाँ

तिरा बोसा लिया होवे सो जाने

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उस की आँखों के अगर वस्फ़ रक़म कीजिएगा

शाख़-ए-नर्गिस को क़लम कर के क़लम कीजिएगा

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ई-पुस्तक 1

दीवान-ए-इश्क़

 

1960

 

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