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इश्क़ औरंगाबादी

औरंगाबाद, भारत

ग़ज़ल 39

शेर 18

आशिक़ की सियह-रोज़ी ईजाद हुई जिस दिन

उस रोज़ से ख़्वाबों की ये ज़ुल्फ़ परेशाँ है

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तू ने क्या देखा नहीं गुल का परेशाँ अहवाल

ग़ुंचा क्यूँ एेंठा हुआ रहता है ज़रदार की तरह

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दुख़्तर-ए-रज़ मत कहो नापाक है

आबरू-ए-दूदमान-ए-ताक है

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ई-पुस्तक 1

दीवान-ए-इश्क़

 

1960

 

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