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सिराजुद्दीन ज़फ़र

1912 - 1972 | कराची, पाकिस्तान

ग़ज़ल 23

शेर 4

दोस्त इस ज़मान-ओ-मकाँ के अज़ाब में

दुश्मन है जो किसी को दुआ-ए-हयात दे

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वो तमाशा हूँ हज़ारों मिरे आईने हैं

एक आईने से मुश्किल है अयाँ हो जाऊँ

हुजूम-ए-गुल में रहे हम हज़ार दस्त दराज़

सबा-नफ़स थे किसी पर गिराँ नहीं गुज़रे

नुमूद उन की भी दौर-ए-सुबू में थी कल रात

अभी जो दौर-ए-तह-ए-आसमाँ नहीं गुज़रे

पुस्तकें 4

Aaine

 

 

ग़ज़ाल-ओ-ग़ज़ल

 

1968

ग़ज़ाल-ओ-ग़ज़ल

 

1968

 

चित्र शायरी 1

शौक़ रातों को है दरपय कि तपाँ हो जाऊँ रक़्स-ए-वहशत में उठूँ और धुआँ हो जाऊँ साथ अगर बाद-ए-सहर दे तो पस-ए-महमिल-ए-यार इक भटकती हुई आवाज़-ए-फ़ुग़ाँ हो जाऊँ अब ये एहसास का आलम है कि शायद किसी रात नफ़स-ए-सर्द से भी शो'ला-ब-जाँ हो जाऊँ ला सुराही कि करूँ वहम-ओ-गुमाँ ग़र्क़-ए-शराब इस से पहले कि मैं ख़ुद वहम-ओ-गुमाँ हो जाऊँ वो तमाशा हूँ हज़ारों मिरे आईने हैं एक आईने से मुश्किल है अयाँ हो जाऊँ शौक़ में ज़ब्त है मलहूज़ मगर क्या मा'लूम किस घड़ी बे-ख़बर-ए-सूद-ओ-ज़ियाँ हो जाऊँ ऐसा अंदाज़-ए-ग़ज़ल हो कि ज़माने में 'ज़फ़र' दौर-ए-आइंदा की क़द्रों का निशाँ हो जाऊँ

 

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