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नज़्म
दिल्ली
दिल्ली कि इस जहाँ में अज़ीम-ओ-क़दीम है
इल्म-ओ-फ़न-ओ-हुनर की सदा से नईम है
गुलज़ार देहलवी
ग़ज़ल
पेश जाती नहीं यूँ भी मिरी उस से हर-चंद
शर्र-ओ-मक्र-ओ-फ़न-ओ-तज़वीर किए जाता हूँ
मुसहफ़ी ग़ुलाम हमदानी
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कुल्लियात
हम मेहर-वर्ज़ क्यूँकर ख़ाली हों आरज़ू से
शेवा यही तमन्ना फ़न्न-ओ-शिआ'र ख़्वाहिश
मीर तक़ी मीर
ग़ज़ल
'मंशा' इक तुम ही नहीं हो ग़म-ए-हस्ती के शिकार
कितने अर्बाब-ए-फ़न-ओ-इल्म-ओ-अदब और भी हैं
मंशाउर्रहमान ख़ाँ मंशा
ग़ज़ल
साहब-ए-इल्म-ओ-फ़न-ओ-फ़िक्र-ओ-नज़र है 'अतहर'
रब्त-ए-बाहम मगर इस दौर के इंसाँ में नहीं






