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नज़्म
दरबार1911
पेश-रौ शाही थी फिर हिज़-हाईनेस फिर अहल-ए-जाह
बअ'द इस के शैख़ साहब उन के पीछे ख़ाकसार
अकबर इलाहाबादी
ग़ज़ल
फ़रहान सालिम
ग़ज़ल
क्यूँकर न ख़ाकसार रहें अहल-ए-कीं से दूर
देखो ज़मीं फ़लक से फ़लक है ज़मीं से दूर
बहादुर शाह ज़फ़र
ग़ज़ल
रौशन-ज़मीर हैं ये तिरे ख़ाकसार-ए-इश्क़
रखते हैं फ़ैज़-ए-इश्क़ से नूर-ओ-सफ़ा-ए-क़ल्ब
पंडित जवाहर नाथ साक़ी
ग़ज़ल
क़ासिद लिखूँ लिफ़ाफ़ा-ए-ख़त को ग़ुबार से
ता जाने वो ये ख़त है किसी ख़ाकसार का
शेख़ इब्राहीम ज़ौक़
ग़ज़ल
फ़क़त तुम्हीं को नहीं अपनी सादगी पे ग़ुरूर
दिमाग़ 'अर्श पे रहते हैं ख़ाकसार के भी














