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शेर
ये थोड़ी थोड़ी मय न दे कलाई मोड़ मोड़ कर
भला हो तेरा साक़िया पिला दे ख़ुम निचोड़ कर
बहादुर सिंह काम बदायूनी
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विषय
ख़ून
ख़ून शायरी
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ग़ज़ल
शैख़ आख़िर ये सुराही है कोई ख़ुम तो नहीं
और भी बैठे हैं महफ़िल में हमीं तुम तो नहीं
क़मर जलालवी
ग़ज़ल
वो उठे हैं ले के ख़ुम-ओ-सुबू अरे ओ 'शकील' कहाँ है तू
तिरा जाम लेने को बज़्म में कोई और हाथ बढ़ा न दे
शकील बदायूनी
ग़ज़ल
साक़ी-ए-गुलफ़ाम बा-सद एहतिमाम आ ही गया
नग़्मा बर लब ख़ुम ब सर बादा ब जाम आ ही गया
असरार-उल-हक़ मजाज़
ग़ज़ल
मुझे क्यूँ न आवे साक़ी नज़र आफ़्ताब उल्टा
कि पड़ा है आज ख़ुम में क़दह-ए-शराब उल्टा
इंशा अल्लाह ख़ान इंशा
ग़ज़ल
मय-कदा सुनसान ख़ुम उल्टे पड़े हैं जाम चूर
सर-निगूँ बैठा है साक़ी जो तिरी महफ़िल में है
बिस्मिल अज़ीमाबादी
नज़्म
शिकवा
अजमी ख़ुम है तो क्या मय तो हिजाज़ी है मिरी
नग़्मा हिन्दी है तो क्या लय तो हिजाज़ी है मिरी
अल्लामा इक़बाल
ग़ज़ल
नींद मस्तों को कहाँ और किधर का तकिया
ख़िश्त-ए-ख़ुम-ख़ाना है याँ अपने तो सर का तकिया
इंशा अल्लाह ख़ान इंशा
ग़ज़ल
मोहतसिब की ख़ैर ऊँचा है उसी के फ़ैज़ से
रिंद का साक़ी का मय का ख़ुम का पैमाने का नाम
फ़ैज़ अहमद फ़ैज़
शेर
सालिक लखनवी
ग़ज़ल
शब ख़ुमार-ए-हुस्न-ए-साक़ी हैरत-ए-मयख़ाना था
आप ही मय आप ही ख़ुम आप ही पैमाना था














