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ग़ज़ल
महफ़िल में तुम अग़्यार को दुज़-दीदा नज़र से
मंज़ूर है पिन्हाँ न रहे राज़ तो देखो
मोमिन ख़ाँ मोमिन
नज़्म
परछाइयाँ
जीने की ख़ातिर मरता हूँ
अपने फ़न को रुस्वा कर के अग़्यार का दामन भरता हूँ
साहिर लुधियानवी
नज़्म
ऐ मेरे सारे लोगो
मिरी बस्ती से परे भी मिरे दुश्मन होंगे
पर यहाँ कब कोई अग़्यार का लश्कर उतरा
अहमद फ़राज़
नज़्म
नानक
आश्कार उस ने किया जो ज़िंदगी का राज़ था
हिन्द को लेकिन ख़याली फ़ल्सफ़ा पर नाज़ था
अल्लामा इक़बाल
ग़ज़ल
अग़्यार का शिकवा नहीं इस अहद-ए-हवस में
इक उम्र के यारों ने भी दिल तोड़ दिया है














