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नज़्म
जश्न-ए-ग़ालिब
ये जश्न मुबारक हो पर ये भी सदाक़त है
हम लोग हक़ीक़त के एहसास से आरी हैं
साहिर लुधियानवी
ग़ज़ल
सख़्त-जानी से मैं आरी हूँ निहायत ऐ 'तल्ख़'
पड़ गए हैं तिरी शमशीर में दंदाने दो
मियाँ दाद ख़ां सय्याह
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नज़्म
दरख़्त मेरे दोस्त
और आरी की हँसी से कभी ख़ौफ़ नहीं खाया
मगर तुम रोक नहीं सकते इन्हें
सरवत हुसैन
नज़्म
सरमाया-दारी
कलेजा फुंक रहा है और ज़बाँ कहने से आरी है
बताऊँ क्या तुम्हें क्या चीज़ ये सरमाया-दारी है
असरार-उल-हक़ मजाज़
ग़ज़ल
'असद' साग़र-कश-ए-तस्लीम हो गर्दिश से गर्दूं की
कि नंग-ए-फ़हम-ए-मस्ताँ है गिला बद-रोज़गारी का
मिर्ज़ा ग़ालिब
उद्धरण
सआदत हसन मंटो
रेख़्ती
तू तो ओकटी नहीं जाएगी मिरे ऐबों में
अरी मैं ऐब-भरी हूँ तो भला तुझ को क्या














