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ग़ज़ल
मन बै-रागी तन अनुरागी क़दम क़दम दुश्वारी है
जीवन जीना सहल न जानो बहुत बड़ी फ़नकारी है
निदा फ़ाज़ली
नज़्म
रोटियाँ
आँखें परी-रुख़ों से लड़ाती हैं रोटियाँ
सीने उपर भी हाथ चलाती हैं रोटियाँ
नज़ीर अकबराबादी
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नज़्म
जाड़े की बहारें
सन्नाटा बाव का चलता हो तब देख बहारें जाड़े की
हर चार तरफ़ से सर्दी हो और सेहन खुला हो कोठे का
नज़ीर अकबराबादी
नज़्म
लफ़्ज़ों के दरमियान
मुझे इस ज़मीन पर चलते हुए अट्ठाईस बरस हो गए
बाप, माँ, बहनों, भाइयों और महबूबाओं के दरमियान
सरवत हुसैन
नज़्म
इलेक्शन
वोटों से बढ़ के अब कोई हथियार भी नहीं
''लड़ते हैं और हाथ में तलवार भी नहीं''
सय्यद मोहम्मद जाफ़री
नज़्म
इत्तिहाद
ये देश कि हिन्दू और मुस्लिम तहज़ीबों का शीराज़ा है
सदियों की पुरानी बात है ये पर आज भी कितनी ताज़ा है
जाँ निसार अख़्तर
ग़ज़ल
ये जो लोग बनों में फिरते जोगी बै-रागी कहलाएँ
उन के हाथ अदब से चूमें उन के आगे सीस नवाएँ














