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ग़ज़ल
आमिर अमीर
ग़ज़ल
गर बाज़ी इश्क़ की बाज़ी है जो चाहो लगा दो डर कैसा
गर जीत गए तो क्या कहना हारे भी तो बाज़ी मात नहीं
फ़ैज़ अहमद फ़ैज़
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शेर
गर बाज़ी इश्क़ की बाज़ी है जो चाहो लगा दो डर कैसा
गर जीत गए तो क्या कहना हारे भी तो बाज़ी मात नहीं
फ़ैज़ अहमद फ़ैज़
नज़्म
ख़िज़्र-ए-राह
जादू-ए-महमूद की तासीर से चश्म-ए-अयाज़
देखती है हलक़ा-ए-गर्दन में साज़-ए-दिल-बरी
अल्लामा इक़बाल
ग़ज़ल
कहीं तो कोई होगा जिस को अपनी भी ज़रूरत हो
हर इक बाज़ी में दिल की हार हो ऐसा नहीं होता
निदा फ़ाज़ली
ग़ज़ल
शिकायत है मुझे या रब ख़ुदावंदान-ए-मकतब से
सबक़ शाहीं-बचों को दे रहे हैं ख़ाक-बाज़ी का
अल्लामा इक़बाल
नज़्म
हमेशा क़त्ल हो जाता हूँ मैं
कभी बाज़ी पलटती है
यहाँ पर सारे मोहरे अपनी अपनी चाल चलते हैं










